Daily Answer Writing
07 December 2021

Q. State and evaluate the provisions of AFSPA in the context of its ability to bring peace in 'disturbed areas'. (150 words)

  • Source: The Hindu - Page 6/Editorial - End the impunity

  • GS 2: Governance, GS 3: Internal security


Introduction: The Armed Forces(Special Powers)Act,1958 was passed back then for Assam and Naga areas to contain the insurgencies in the respective areas. It is currently effective in whole of Nagaland, Assam, Manipur(excluding Imphal) & parts of Arunachal Pradesh. Jammu and Kashmir has a similar act too. It was also implemented in Punjab, Tripura and Meghalaya in various times and revoked later on.

 

Provisions of the AFSPA:

    • AFSPA gives armed forces the power to maintain public order in “disturbed areas”.
    • Powers acquired by the armed forces: They have the authority to -
      • Prohibit a gathering of five or more persons in an area, can use force.
      • Can open fire after giving due warning if they feel a person is in contravention of the law.
      • If reasonable suspicion exists, the army can also arrest a person without a warrant;
        • Any person arrested or taken into custody may be handed over to the officer in charge of the nearest police station along with a report detailing the circumstances that led to the arrest.
      • Enter or search a premises without a warrant;
      • Ban the possession of firearms.
    • Definition of a 'Disturbed area'
      • Disturbed area is one which is declared by notification under Section 3 of the AFSPA.
      • A suitable notification would have to be made in the Official Gazette.
      • Reason for declaration: An area can be disturbed due to differences or disputes between members of different religious, racial, language or regional groups or castes or communities.
    • Impact upon declaration of a disturbed area:
      • Disturbed (Special courts) act, 1976: Once it is declared a disturbed area, status quo is maintained at least for 3 months.
      • The Central Government, or the Governor of the State or administrator of the Union Territory can declare the whole or part of the State or Union Territory as a disturbed area.
      • As per Section 3 , it can be invoked in places where “the use of armed forces in aid of the civil power is necessary”.

 

Criticism of AFSPA:

    • Cultivating a sense of Impunity: Special laws protecting armed forces personnel from the legal consequences of their operations and excesses. There is evidence that the law has created a sense of impunity among the security forces wherever it has been invoked.
    • Frequent misuse of the Act: The recent incidents of killing of over a dozen civilians by the Armed forces shows that forces are sometimes too trigger-happy.
    • Against the principles of Fundamental rights: Art 22 states prevents a person from illegal preventive detention. Preventive detention can be "arrested or detained under any law  providing for preventive detention" for up to 3 months. This law allows detention without warrant.
    • Often becomes an issue of separatism itself: Many groups in Nagaland have demanded the revocation of the act. Iram Sharmila had become famous for resistance against the law in Manipur for more than 15 years.
    • Often seen as being against Human rights: AFSPA violates the Universal Declaration of Human Rights (UDHR), the International Covenant on Civil and Political Rights (ICCPR), and the Convention against Torture( India is a signatory, but it has not ratified it).

Conclusion: Jivan Reddy Report: The Central government appointed a five member committee headed by Justice B.P. Jeevan Reddy in November 2004 to review AFSPA. The committee submitted its report in 2005. Committee report that recommended to revoke AFSPA from certain areas. It had said that besides repealing the Act, recommended that the Unlawful Activities (Prevention) Act, 1967 should be modified to clearly specify the powers of the armed forces and the Central forces.

 

The reports of the Justice Verma Committee (2013) and the Justice Hegde Commission (2013) supported need to address the abuses committed under the AFSPA and end the effective impunity enjoyed by security forces.

 

प्रश्न. AFSPA के प्रावधानों के बारे में बताइए तथा 'अशांत क्षेत्रों ' में शांति लाने की इसकी क्षमता के संदर्भ में मूल्यांकन करें । (150 शब्द)


परिचय: सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम,1958  को असम और नागा क्षेत्रों के लिए  पारित किया गया था ताकि संबंधित क्षेत्रों में विद्रोह को नियंत्रित किया जा सके । यह वर्तमान में पूरे  नागालैंड, असम, मणिपुर (इंफाल को छोड़कर) और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में प्रभावी है। जम्मू-कश्मीर में भी यह लागू  है। इसे पंजाब, त्रिपुरा और मेघालय में भी विभिन्न समयों में लागू किया गया था और बाद में इसे रद्द कर दिया गया था। 

अफस्पा के प्रावधान:

    • अफस्पा सशस्त्र बलों को 'अशांत क्षेत्रों' में कानून व्यवस्था बनाए रखने की शक्ति देता है।
    • सशस्त्र बलों द्वारा अर्जित शक्तियां: उनके पास क्या अधिकार है -
      • किसी क्षेत्र में पांच या अधिक व्यक्तियों के जमावड़े पर रोक लगाते हैं, बल प्रयोग कर सकते हैं ।
      • यदि उन्हें लगता है कि कोई व्यक्ति कानून का उल्लंघन कर रहा है तो उचित चेतावनी देने के बाद गोली चला सकते हैं ।
      • यदि उचित संदेह मौजूद है, तो सेना बिना वारंट के किसी व्यक्ति को गिरफ्तार भी कर सकती है;
        • गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने वाली परिस्थितियों का ब्यौरा देने वाली रिपोर्ट के साथ निकटतम पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी को सौंपा जा सकता है ।
      • वारंट के बिना किसी परिसर में प्रवेश कर सकता है या खोजबीन कर सकता है;
      • आग्नेयास्त्रों के रखने पर प्रतिबंध लगा सकती है
    • 'अशांत क्षेत्र' की परिभाषा
      • अशांत क्षेत्र वह क्षेत्र है जिसे अफस्पा की धारा 3 के तहत  अधिसूचना  द्वारा घोषित किया जाता है।
      • सरकारी राजपत्र में एक उपयुक्त अधिसूचना जारी करनी होती है ।
      • घोषणा का कारण: एक क्षेत्र विभिन्न धार्मिक, नस्लीय, भाषा या क्षेत्रीय समूहों या जातियों या समुदायों के सदस्यों के बीच मतभेदों या विवादों के कारण 'अशांत क्षेत्र' घोषित किया जा सकता है ।
    • अशांत क्षेत्र की घोषणा पर प्रभाव:
      • अशांत (विशेष न्यायालय) अधिनियम, 1976: एक बार जब इसे अशांत क्षेत्र घोषित कर दिया जाता है, तो कम से कम 3 महीने के लिए यथास्थिति बनी रहती है।
      • केंद्र सरकार, या राज्य के राज्यपाल या केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासक पूरे या राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के हिस्से को अशांत क्षेत्र घोषित कर सकते हैं।
      • धारा 3 के अनुसार, इसे उन स्थानों पर लागू किया जा सकता है जहां नागरिक बल की सहायता में सशस्त्र बलों का उपयोग आवश्यक होता है।

 

अफस्पा की आलोचना:

    • दण्ड से मुक्ति की भावना को उजागर करता है : सशस्त्र बलों के कर्मियों को उनके अभियानों और ज्यादतियों के कानूनी परिणामों से बचाने वाला विशेष कानून है । जहां भी इसे लागू किया गया है, इस बात के सबूत हैं कि कानून ने सुरक्षा बलों के बीच, वहां दण्ड से मुक्ति की भावना पैदा होती है ।
    • अधिनियम का लगातार दुरुपयोग: सशस्त्र बलों द्वारा एक दर्जन से अधिक नागरिकों की हत्या की हालिया घटनाओं से पता चलता है कि सेनाएं कभी-कभार गोली मारने से खुश होती हैं ।
    • मौलिक अधिकारों के सिद्धांतों के खिलाफ: संविधान की धारा 22 राज्यों के अवैध पूर्व गिरफ़्तारी से व्यक्ति को रोकता है । निवारक निरोध इसके तहत "3 महीने तक निवारक निरोध के लिए प्रदान करने वाले किसी भी कानून के तहत गिरफ्तार या हिरासत में लिया जा सकता  है" । यह कानून बिना वारंट के नजरबंदी की अनुमति देता है ।
    • अक्सर अलगाववाद का मुद्दा बन जाता है: नागालैंड में कई समूहों ने इस अधिनियम को रद्द करने की मांग की है । इराम  शर्मिला 15 साल से अधिक समय से मणिपुर में कानून के खिलाफ प्रतिरोध के लिए प्रसिद्ध थी
    • अक्सर मानवाधिकारों के खिलाफ होने के रूप में देखा जाता है: अफस्पा मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (यूडीएचआर), नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय करार (आईसीसीपीआर) का उल्लंघन करता है, और यातना के खिलाफ कन्वेंशन (भारत एक हस्ताक्षरकर्ता है, लेकिन उसने इसकी पुष्टि नहीं की है) ।

निष्कर्ष: जीवन  रेड्डी रिपोर्ट:  केंद्र सरकार ने अफस्पा की समीक्षा के लिए नवंबर 2004 में न्यायमूर्ति बीपी जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति नियुक्त की थी । समिति ने 2005 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। समिति की रिपोर्ट जिसमें कुछ क्षेत्रों से अफस्पा को रद्द करने की सिफारिश की गई थी । इसने कहा था कि इस अधिनियम को निरस्त करने के अलावा, यह सिफारिश की गई है कि सशस्त्र बलों और केंद्रीय बलों की शक्तियों को स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट करने के लिए गैरकानूनी गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम, 1967 को संशोधित किया जाना चाहिए।

 

जस्टिस वर्मा समिति (2013)  और जस्टिस हेगड़े आयोग (2013)  की रिपोर्टों ने अफस्पा के तहत किए गए दुर्व्यवहार को संबोधित करने और सुरक्षा बलों द्वारा प्राप्त प्रभावी दण्ड को समाप्त करने की आवश्यकता का समर्थन किया है।

 

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